Ramesh Chandra Sharma

Ramesh Sharma has been living and learning with the rural and indigenous people of India since nearly 40 years now. He left doctoral studies in IIT Delhi to pour his energy into working with the tribals of Bastar, in his home state Chhattisgarh. He is the campaign coordinator of the largest non-violent movement in India, Ekta Parishad. Spanning 11 states, with 1100 community-based organisations. Ramesh is also a member of various groups such as the National Task Force for Land Reforms, the Central Enquiry Committee on Tribal Self Rule, and the National Land Reforms Committee. He has also delivered lectures on people, nature, economics and life in India at Cambridge University, the London School of Economics, and Oxford University as well as the British Parliamentary Committee.
[www.ektaparishad.com]

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भारत है एक अभीप्सा – एक प्यास ‘सत्य’ को पा लेनें की. उस सत्य को जो हमारी हृदय की धमनियों में बसता है. वह सत्य जो युगों से हमारी चेतना की तहों में सोया है. जो अब शनैः शनैः विस्मृति के धुंध से बाहर आ रहा है – उसकी पुनर्स्मृति और पुनरुद्घोषणा ही ‘भारतवर्ष’ का पुनर्निर्माण है. अमृतस्य पुत्रः’ जिसनें इस उद्घोषणा को सुना वो ही इस सनातन भूमि के अधिकारी हैं. इस धरती पर कोई कहीं भी पैदा हो – किसी भी देश में और किन्ही भी देशान्तरों में – यदि उसकी खोज सनातन-धर्म की खोज है तो वह निःसंदेह ‘हिन्दू’ ही होगा. इसलिये ‘हिन्दू नैक्टर’ वृत्तचित्र का दर्शन सही अर्थों में पुनर्जागरण और सनातन संधान की नई यात्रा है.

‘हिन्दू नैक्टर’ उस सनातन भारत और जीवन-दर्शन के ‘अमरत्व’ का अनुसंधान है, जिसके बिना इस देश, देह और दर्शन को आत्मसात करना संभव नहीं है. कदाचित यह महज एक दर्शन और दृष्टिकोण से कहीं अधिक ‘अहं ब्रम्हास्मि’ का आध्यात्मिक बोध है – जहाँ धर्म, एक मानव निर्मित परिधि से कहीं अधिक व्यापक है. एक दर्पण की तरह जो अस्तित्व और अनस्तित्व का ही प्रतिबिम्ब है. उतने ही यथार्थ के साथ जितना हम देखना या होना चाहते हैं. एक ऐसी जीवनचर्या जो उत्तरोत्तर ‘आत्मशुद्धि’ की आस्था का मार्ग है. वह ‘जाकी रही भावना जैसी’ की सरलता और सगुणता के साथ-साथ ‘सत्यं ब्रह्म’ की निरपेक्षता और निर्गुणत्व के धरातल पर समाज को धार्मिक स्वाधीनता देता है. एक धार्मिक जनतंत्र में मौलिक मत और मतान्तरों की प्रतिस्थापना के समानांतर. एक आकार से कहीं अधिक आस्था और आत्मदर्शन की व्यापकता के धर्म और कर्म का जीवन-दर्शन होते हुये, सनातन धर्म की सार्थकता के साथ.

‘हिन्दू नैक्टर’ महज एक दर्शन के व्याख्यान से आगे ‘जिज्ञासा’ का सनातन प्रवाह है जहाँ प्रश्नोत्तर से अधिक ‘आत्मबोध’ मुखरित है. मौलिक अर्थों में आस्तिकता और नास्तिकता के दर्शन और दृष्टिकोण से ऊपर उठकर ‘आस्था की आजादी’ केवल ‘सनातन धर्म’ में ही संभव है. इसलिये भारत की नागरिकता का अर्थ केवल राजनैतिक पहचान से कहीं अधिक एक ‘नैतिक आग्रह’ के हैं. वह आग्रह जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के वैश्विक सहजीवन और वैश्विक नागरिकता का वर्तमान और भविष्य है. यह आग्रह ही ‘हिन्दू नैक्टर’ का प्रथम और अंतिम सन्देश है. सनातन धर्म का सनातन सन्देश.

Posted on October 27, 2014. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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